रजनीकांत की ‘कबाली’ देखने जा रहे हैं? यहां पढ़ें रिव्यू…

रजनीकांत की ‘कबाली’ देखने जा रहे हैं? यहां पढ़ें रिव्यू…

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ये भूलना आसान है कि रजनीकांत कभी ऐसे एक्टर थे जिन्होंने रियल करेक्टर प्ले किए हैं और शानदार प्रदर्शन किया है। उस जनरेशन के लिए जो रजनीकांत को उन पर बन चुके जोक्स के लिए जानती है, या उनकी ब्लॉकबस्टर्स के लिए जैसे ‘बाशा’, ‘शिवाजी’ और ‘एंथिरन’.. उन्हें मैं सुझाव देना चाहूंगा कि वो रजनीकांत के पिछले काम को देख लें। मैं स्ट्रांग्ली रिकमेंड करना चाहूंगा मणिरत्नम की फिल्म ‘थालापथी’। ये उस समय से पहले की बात है जब से रजनीकांत उन रोल्स में फंस के रह गए जहां उनका उद्देश्य सिर्फ ये था कि उन्हें रजनी कल्चर को और बढ़ाना है।

पा रंजीत द्वारा निर्देशित ‘कबाली’ एक लॉजिकल कहानी बताने की कोशिश करती है, पर फिल्म के मेकर्स रजनी मेनिया को कैश करने से खुद को नहीं रोक पाते। रजनीकांत एक बूढ़े डॉन के किरदार में हैं, जिसका दिल सोने का है और वो हाल ही में जेल से छूटकर आया है। जेल से छूटने से बिल्कुल मिनटों पहले, 65 साल का ये स्टार क्रोसबार पर पुल-अप्स परफोर्म करते हैं बिना पसीने की एक बूंद बहाए।

 मलेशिया में सेट, दो गैंग्स की दुश्मनी पर आधारित ये फिल्म खूब हिंसा से भरी है। रजनीकांत के करेक्टर कबाली के सामने है एक एशियन विलेन टॉम ली यानी ताईबानी एक्टर विन्स्टन चाउ, जिसके आदमी कबाली की पत्नी यानी राधिका आप्टे की मौत के जिम्मेदार हैं। कबाली के दुश्मन उसे मारने के लिए एक तेज तर्रार महिला असैसिन्स को हायर करते हैं, इससे पहले कि कबाली उनके गले की हड्डी बन जाए।

फिल्म का पहला आधा भाग फ्लैशबैक में जाते हुए बहुत तेजी से बढ़ता है, जहां हमारे हीरो की, पावर तक पहुंचने की कहानी को बताया गया है, साथ की कबाली और टॉम ली की दुश्मनी के पीछे के इतिहास को भी दिखाया गया है। फिल्म का एक ट्विस्ट एक अहम किरदार कि सच्चाई को सामने लाता है, जिसके बाद एक और मेजर डिस्कबरी होती है। लेकिन इंटरमिशन के बाद, फिल्म मानो गोलीबारी और खूनखराबे में तबदील हो जाती है, जिसके बाद कहानी जल्द ही कहीं गुम हो जाती है।

क्या ये काफी है कि रजनीकांत के फैंस को मेहज उनकी शानदार जीवन की छवि दिखाई जाए, जो अच्छे डायलॉग बोलता है, अच्छे कपड़े पहनते हैं, अकड़ के चलता है और एक की झटके में अपने दुश्मनों को मार गिराता है? शायद नहीं। वो फॉर्मूला अब पुराना हो चुका है। इसलिए ‘कबाली’ ‘लिंगा’ से अच्छी तो है पर फिर भी निराश करती है। मैं ‘कबाली’ को पांच में से दो स्टार देता हूं। रजनीकांत अभी भी स्क्रीन पर छा जाते हैं, पर फिल्म में कोई दम नहीं है।

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